हमारा भविष्य

सर्वाधिक प्रवेश वास्ते स्कूलों में मची है होड़
कोई नकल की लालच देता कोई चल रहा पटरी छोड़।
समाधान विसराये सारे करें समस्या की निगरानी
लोभ मोह मदयुक्त व्यवस्था पानीदार हुए बेपानी।
ट्रांसपोर्ट से कोई कमाये कोई पुस्तक पेटेंट कराये
छात्रवृत्ति में आधेदारी बिन पहुँचे प्रेक्टिकल सुलझाये।
मार्कसीट प्रवेशपत्र व टीसी सीसी आय के साधन
अपसेंटी के लिए सुनिश्चित देना होता है बहुधा धन।
प्रवेश वसूली और परीक्षा महामठों का काम है
बिन शिक्षक फैकल्टी पनपे शिक्षण का बस नाम है।
कहीं चार कहीं तेरह बच्चे कहीं-कहीं सौ संख्या पूरी
जगह-जगह विद्यालय खोले मानो धन्धे की मजबूरी।
सारा शिक्षण शुल्क बाँट दें फिर भी थोड़ी मिले पगार
जो विभाग सम्पन्न हैं उनमें भी वेतन की वही धार।
अध्यापक हो गया है कोरम चाटुकार की चाँदी है
विद्वानों की शिक्षा विद्या धनपतियों की बाँदी है।
नहीं व्यवस्था में वह छन्नक जो उपयोगी छाँट निकाले
ब्यूटीपार्लर का परसोना समझ न आयें गोरे-काले।
पंगु हो रही भावी पीढ़ी ऊपर से मँहगाई मार
नौकरियों का पड़ा है टोटा आधी आबादी बेकार।
अपनी संतति को ही सारे ओहदा बड़ा दिलाना चाहें
लूट रहे हक अधीनस्थ के भले स्वयं भी भरते आहें।
मानवता बलिदान कराते नरपशुओं को देखा है
भारत में रह भारत मां की निन्दा करते पेखा है।
लोग थूकते हैं सूरज पर याद न रखते अपनी हाल
आत्मज्ञान परधन ज्यादा हित सतत् बजाते रहते गाल।
ऐसे में नित भविष्य हमारा अंधकार में डूब रहा
चुप रहते न बने और छोटे मुँह से न जाय कहा।
साम दाम व भेद नीति से लोक सँवारें अब नरनाथ
अगर न भ्रष्टाचार रुके तो दण्ड नीति का पकड़ें साथ।
नाक पे भी नासूर अगर हो तो भी उसे कटाना होगा
मिटे ब्याधि जीवन की सारी करें सभी कानूनी योगा।।

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